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दोहे
Posted On 02/03/2008 15:18:07 by prathviraj

दोहे



मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।

जा तनु की झाँई परे, स्याम हरित दुति होय॥



अधर धरत हरि के परत, ओंठ, दीठ, पट जोति।

हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्र धनुष दुति होति॥



या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।

ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ॥



पत्रा ही तिथी पाइये, वा घर के चहुँ पास।

नित प्रति पून्यौ ही रहे, आनन-ओप उजास॥



कहति नटति रीझति मिलति खिलति लजि जात।

भरे भौन में होत है, नैनन ही सों बात॥



नाहिंन ये पावक प्रबल, लूऐं चलति चहुँ पास।

मानों बिरह बसंत के, ग्रीषम लेत उसांस॥



इन दुखिया अँखियान कौं, सुख सिरजोई नाहिं ।

देखत बनै न देखते, बिन देखे अकुलाहिं॥



सोनजुही सी जगमगी, अँग-अँग जोवनु जोति।

सुरँग कुसुंभी चूनरी, दुरँगु देहदुति होति॥



बामा भामा कामिनी, कहि बोले प्रानेस।

प्यारी कहत लजात नहीं, पावस चलत बिदेस॥



गोरे मुख पै तिल बन्यो, ताहि करौं परनाम।

मानो चंद बिछाइकै, पौढ़े सालीग्राम॥



मैं समुझ्यो निराधार, यह जग काचो काँच सो।

एकै रूप अपार, प्रतिबिम्बित लखिए तहाँ॥




- बिहारी



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